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पुतिन को रूस में कोई चुनौती क्यों नहीं दे पाता है

Updated: 17 जुलाई 2020 10:45 PM IST

चतुराई और दिलेरी, किसी मार्शल आर्ट्स खिलाड़ी की दो बड़ी ख़ूबियां मानी जाती हैं. जूडो में ब्लैक बेल्ट रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन इन दोनों ख़ूबियों के मालिक हैं.

माचो मैन की छवि वाले पुतिन कभी अल्हड़ नौजवानों की तरह महंगी मोटर-बाइक की सवारी करते हैं, तो कभी जूडो का पैंतरा आज़माकर अपने प्रतिद्वंद्वी को पटकते हैं.

साइबेरिया में बिना शर्ट पहने घुड़सवारी या डाइविंग सूट पहनकर गहरे समुद्र में गोताखोरी, या फिर फाइटर जेट उड़ाकर आकाश की ऊँचाई नापना, पुतिन के ये सारे अंदाज़ उनके चाहने वालों को लुभाते हैं, और ना चाहने वाले, लाख चाहकर भी उनका कुछ नहीं कर पाते.

रूस में एक कीर्तिमान जोसेफ़ स्टालिन ने बनाया था, तो दूसरा कीर्तिमान व्लादिमीर पुतिन के नाम पर है. पुतिन ही हैं जो स्टालिन के बाद रूस की सत्ता के शिखर पर दो दशक से काबिज़ हैं. जहाँ स्टालिन सोवियत यूनियन के पर्याय थे तो वहीं पुतिन दुनियाभर में रूस की पहचान बन चुके हैं.

पुतिन का मौजूदा चौथा कार्यकाल साल 2024 में ख़त्म होना है, लेकिन उससे चार साल पहले ही संवैधानिक सुधारों पर विवादित राष्ट्रव्यापी मतदान के ज़रिए पुतिन अगले 16 साल तक भी सत्ता के शिखर पर बने रह सकते हैं.

यही वजह है कि रूस के अंदर-बाहर मौजूद पुतिन के विरोधी और आलोचक संवैधानिक सुधारों के रास्ते पुतिन की मंशा पर सवाल खड़े कर रहे हैं.

पार्ट 1 घरेलू मोर्चा

”उनका ये पक्का विचार है कि देश के शासन की बागडोर कई हाथों में नहीं होनी चाहिए. अतीत की बुनियाद पर वो ये मानते हैं कि किसी तरह की समानांतर सत्ता, देश के भीतर कलह की वजह बनती है. जैसा कि पहले हो चुका है, वो नहीं चाहते कि राजनीतिक टकराव, गृहयुद्ध और उस तरह की घटनाएँ दोबारा हों.”

ये हैं हमारे पहले विशेषज्ञ दिमित्री ट्रेनिन, जो थिंक टैंक- कारनेगी मॉस्को सेंटर के डायरेक्टर हैं. दिमित्री ट्रेनिन मानते हैं कि देश के भीतर स्थिरता, पुतिन की पहली प्राथमिकता है.

”क्षेत्रीय स्तर पर जो बड़े नेता है, जो गवर्नर्स हैं, वो किसी संप्रभु शासक की तरह बर्ताव करते हैं. इसलिए पुतिन उन सबको फेडरल कॉन्स्टीट्यूशन के दायरे में लेकर आए. रशियन स्टेट की अथॉरिटी पुतिन ने दोबारा क़ायम की. ये सब उन्होंने बड़े ही पारंपरिक तरीक़े से किया.”

घरेलू मोर्चे पर पुतिन के सामने एक और चुनौती थी और वो चुनौती थी अल्ट्रा रिच यानी बेहद धनवान लोगों की.

वर्ष 1991 में सोवियत यूनियन के बिखरने के बाद, बोरिस येल्तसिन ने रूस के प्राकृतिक संसाधन और राजनीतिक शक्तियाँ मुट्ठीभर लोगों में बाँट दी. इसके बदले में उन्होंने बोरिस येल्तसिन को दोबारा राष्ट्रपति बनने में मदद की.

”ऐसे लोगों को कमज़ोर करना पुतिन की प्राथमिकता में शामिल था. ये लोग कई तरीक़ों से रूस पर शासन कर रहे थे. उन्होंने सारा माल बटोरकर उसका निजीकरण कर दिया था. ये सिर्फ़ बिजनेसमैन नहीं थे, बल्कि राजनीतिक शक्ति भी इन्हीं के हाथ में थी. पुतिन ने उनसे कहा कि बिज़नेस कर लो या राजनीति, दोनों साथ नहीं कर सकते.”

लेकिन जो नहीं माने, उनकी जगह जेल में थी, उन्हें निर्वासित कर दिया गया या वो इस दुनिया में ही नहीं बचे. सोवियत रूस के विघटन के बाद जो हालात बने, लोगों को पुतिन में उम्मीद की किरण नज़र आई. पुतिन ने भी रूस के लोगों की ताक़त को कभी कम करके नहीं आंका.

”100 साल के इतिहास के भीतर दो बार ऐसा हुआ जब रूस के लोगों ने रातों-रात सत्ता बदल दी. साल 1917 में ज़ार का ख़ात्मा हुआ और 1991 में सोवियत यूनियन का पतन, दोनों ही समय लोगों ने सत्ता को सोचने का मौक़ा नहीं दिया. पुतिन ने रूस के इतिहास से ये सबक अच्छी तरह सीखा है.”

पार्ट 2 रूस को दोबारा ‘महान’ बनाना

”पुतिन जब पहली बार सत्ता में आए, मुझे लगता है कि उस समय रूस के भीतर और बाहर भी उनसे बहुत उम्मीदें लगाई गई थीं. उस समय वो एक युवा नेता थे, उनमें ऊर्जा नज़र आती थी. वो रूस के लिए कुछ करने के लिए तत्पर थे. घरेलू मोर्चे पर मुझे लगता है ये सच था.”

ये हैं हमारी दूसरी विशेषज्ञ मेवी डिजेस्की, पूर्व विदेशी मामलों की संवाददाता, जो कई दशकों से रूस को देख-समझ रही हैं. उनका मानना है कि विदेशी मोर्चे पर पुतिन शुरुआती दिनों में नाकाम हुए.

रूस से बाहर समीकरण तेज़ी से गड़बड़ाए. उसकी कई वजहें थी. मेरे ख़्याल से एक वजह तो यही थी कि पुतिन को अंतरराष्ट्रीय मंचों का अनुभव नहीं था. वो पूर्व सोवियत यूनियन के कोई कॉस्मोपोलिटन नहीं थे.”

रूस में तब लोगों को ये लगता था कि उन पर ख़तरा मंडरा रहा है. पूर्व सोवियत ब्लॉक के देशों को यूरोपियन यूनियन का सदस्य बनाया जा रहा था. नेटो भी उनसे अपनी नज़दीकी बढ़ा रहा था.

”ख़ासतौर पर अमरीका, साथ में पश्चिमी यूरोपीय देश, कमज़ोर हो चुके रूस का फ़ायदा उठा रहे थे. वो रूस के सीमांत इलाक़ों में अपनी सीमाओं को बढ़ा रहे थे. जब आप नक्शा देखेंगे, तब समझ में आता है कि उस समय रूस की चिंता क्या रही होगी.”

रूस के लोगों को लग रहा था कि उनसे साथ अन्याय हो रहा है. उन्हें लग रहा था कि पुतिन ने अगर कुछ नहीं किया, तो रूस को हाशिए पर रहना होगा.

”रूस को लगा कि पश्चिमी देश ना केवल विस्तारवादी हो रहे हैं, बल्कि विचारधारा के स्तर पर भी रूस मे दख़लंदाज़ी कर रहे हैं. रूस ने देखा कि उसकी सीमा से सटे यूक्रेन में ऑरेंज रिवॉल्यूशन हुआ. रूस ये समझ रहा था यूक्रेन के घटनाक्रम में विदेशों का भी हाथ है.”

ऑरेंज रेवॉल्यूशन के चार साल बाद, जॉर्जिया के साथ युद्ध के दौरान पुतिन को अहसास हुआ कि रूस की सीमा, पश्चिमी देशों के कितने नज़दीक है.

”लड़ने गए रूसी सैनिकों ने देखा कि जॉर्जिया के सैनिकों के पास गज़ब के हथियार हैं, उनका लड़ने का तरीक़ा भी अलग है. पश्चिमी देशों ने उनकी मदद की थी. यहाँ रूस को अहसास हुआ कि उसे अपने डिफेंस सिस्टम को आधुनिक बनाना होगा. उस समय तेल के दाम ऊँचे थे, रूस की अर्थव्यवस्था पहले से बेहतर थी, इससे वो रूस के डिफेंस सेक्टर को मॉर्डन बनाने की शुरुआत कर सके.”

इससे पुतिन को रूस के साथ-साथ अपनी भी प्रतिष्ठा बढ़ाने में मदद मिली. जल्द ही पुतिन ने सीरिया के गृहयुद्ध में दख़ल देकर राष्ट्रपति बशर-अल असद की मदद करने का फ़ैसला किया.

”रूस ने देखा था कि पश्चिमी देशों की दख़लंदाज़ी से इराक़ और लीबिया में क्या हुआ. पुतिन को लगा कि इस तरह अस्थिरता की वजह से रूस के हित भी ख़तरे में पड़ जाएंगे. इसमें चेचन भी शामिल थे जो इस्लामी कट्टरपंथियों की ओर से लड़ने के लिए सीरिया गए थे. रूस ने इसे बड़े ख़तरे की तरह माना.”

चेचेन्या, रूस और अलगाववादियों के बीच लंबे समय से संघर्ष का केंद्र रहा है.

मेवी डिजेस्की का मानना है कि पुतिन रूस को दुनिया की नज़र में एक ताक़त के तौर पर पेश करने में कामयाब हुए. अगर आप रूस के पिछले 50 साल का इतिहास उठाकर देखेंगे तो पाएँगे कि वहाँ कितनी उथल-पुथल और अव्यवस्था रही है. वो दौर पुतिन ने भी देखा था.

”उनका मुख्य लक्ष्य अमरीकी समाज में जो ध्रुवीकरण है, उसे समझना और उसका फ़ायदा उठाना था, जहाँ एक ही मुद्दे पर दो विरोधी गुट टकरा रहे थे. रूस ने अमरीकी समाज में मतभेद पैदा नहीं किए, लेकिन जो मतभेद हैं उनका फ़ायदा ज़रूर उठाया.”

ये हैं हमारी तीसरी विशेषज्ञ हैं एंजेला स्टेंट, जो रूसी विदेश नीति की जानकार और जॉर्ज टाउन यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर हैं.

उनका मानना है कि पुतिन रूस के विरोधियों को कमज़ोर करने और इसका फ़ायदा उठाने का कोई मौक़ा नहीं छोड़ते.

”किसी की कमज़ोरी भाँपने और मौक़े को पहचानने में पुतिन बड़े माहिर हैं. जैसे राष्ट्रपति बनने के बाद डोनाल्ड ट्रंप ने जब नेटो और अपने अन्य यूरोपीय सहयोगियों के प्रति आलोचनात्मक रवैया अपनाया, तब पुतिन ने बड़ी कुशलता से इसका फ़ायदा उठाया. उन्होंने यूरोपीय यूनियन की आलोचना करने वाली पार्टियों का समर्थन किया और मौक़ा पाकर उनकी आर्थिक मदद भी की.”

एंजेला स्टेंट याद दिलाती हैं कि पुतिन राष्ट्रपति बाद में बने, पहले तो वो रूसी ख़ुफ़िया एजेंसी केजीबी में काम करते थे और वहाँ जो पैंतरे उन्होंने सीखे, आज तक आज़मा रहे हैं.

रूस के चीन से नज़दीकी संबंध हैं जिसे पुतिन की विदेश नीति की सफलता कहा जा सकता है. दोनों देश कारोबारी साझेदार हैं जहाँ पश्चिमी जगत की कोई भूमिका नहीं होती.

पुतिन की विदेश नीति में अफ्रीका भी बड़ा महत्वपूर्ण है.

पार्ट 4 दौलत और सत्ता का मेल

”मुझे हर वो तर्क निराश करता है, जिसमें पुतिन को जेम्स बॉन्ड की फिल्मों में नज़र आने वाले ब्लोफेल्ड की तरह पेश किया जाता है, जो एक सुपर चेयर पर सफ़ेद बिल्ली को लेकर बैठा रहता है, जिसके एक बटन दबाते ही दूर किसी देश में धमाका हो जाता है.”

मिलिए हमारे चौथे और आख़िरी विशेषज्ञ से, इनका नाम है ओलिवर बुलो, जो पेश से पत्रकार हैं और कई वर्षों से मॉस्को में रहते हैं.

”पुतिन ने सत्ता में जिस तरह बर्ताव किया है, अपने पुराने दोस्तों और सहयोगियों का जिस तरह से भला किया है, वो सब मिलकर रूस की अर्थव्यवस्था के एक बड़े हिस्से को कंट्रोल करते हैं. इसका मतलब ये हुआ कि पुतिन उनसे किसी भी समय कुछ भी कह सकते हैं. ये ताक़त है और ताक़त ही असली दौलत है.”

पुतिन पिछले 20 साल से लगातार रूस की सत्ता पर काबिज़ हैं. कभी प्रधानमंत्री तो कभी राष्ट्रपति, सत्ता हमेशा उनके हाथ में रही. अब सोचिए कि किसी दिन पुतिन को लगे कि बहुत हो गया, अब आराम किया जाए, तब क्या वो ऐसा कर पाएँगे?

”पुतिन के आसपास जो लोग हैं, उनके लिए वाक़ई ये ज़रूरी है कि पुतिन सत्ता में बने रहें, ताकि जिस संपत्ति पर उनका नियंत्रण है, वो उनके हाथ से ना निकल जाए. ये बहुत दिलचस्प है कि आख़िर कौन किसके लिए काम कर रहा है. ये अपने ही बुने जाल में फँस जाने जैसा है. पुतिन के बिना ये लोग ख़तरे में पड़ जाएँगे, इसलिए वो नहीं चाहेंगे कि पुतिन सत्ता से हटें.”

यही वजह है कि रूस में हालिया संवैधानिक सुधारों पर सबकी नज़रें टिकी रहीं. इन्हीं संवैधानिक सुधारों के बूते पुतिन अगले 16 साल तक रूस की सत्ता में शिखर पर रह सकते है.

तब शायद किसी मोड़ पर पुतिन भी वैसा ही करना चाहेंगे जैसा कि 1991 में बोरिस येल्तसिन ने किया था.

”उस समय उत्तराधिकारी की तलाश ऐसे व्यक्ति पर आकर ख़त्म हुई, जो ये सुनिश्चित करे कि बोरिस येल्तसिन के परिवार को कोई ख़तरा नहीं होगा. बाकी चीजों पर पुतिन मोल-तोल कर रहे थे, लेकिन वो कभी भी येल्तसिन या उनके परिवार के पीछे नहीं पड़े.”

रूस में पुतिन फिलहाल अजेय हैं. तमाम विवादों के बावजूद, संवैधानिक सुधारों को मिला ‘कथित समर्थन’ ये बताता है कि उनके सिर पर रूसी जनता का भी हाथ है.

पुतिन जब तक विदेशी मोर्चों पर डटे रहेंगे, घरेलू मोर्चे पर भी उनकी धकम बनी रहेगी.

पुतिन की राजनीति बताती है कि वो लंबी रेस का घोड़े क्यों साबित हुए, लेकिन, लंबी रेस के घोड़े को भी, कभी ना कभी तो रूकना ही पड़ता है.

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