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कामयाबी अच्छी बात है, पर कहीं ये आपकी राह में रोड़ा तो नहीं?

सांकेतिक तस्वीर

ख़बर सफ़र मीडिया

अपडेटेड : 21 जुलाई 2020 10:00 PM

पिछली कामयाबियां नए मौकों की राह में बाधा बन सकती हैं और नाकामी की ओर भी ले जा सकती हैं.

अगर मैनेजरों ने ग़लती न की होती तो आपके कंप्यूटर, टैबलेट या स्मार्टफोन पर आज ज़ेरॉक्स का लोगो लगा होता.

1970 के दशक की शुरुआत में ज़ेरॉक्स की फोटोकॉपी मशीनें दुनिया भर में छा गई थीं. फोटोकॉपी का मतलब था ज़ेरॉक्स.

ज़ेरॉक्स का मैनेजमेंट कंप्यूटिंग की संभावनाओं में भी दिलचस्पी ले रहा था. नई तकनीक विकसित करने के लिए कैलिफोर्निया में एक सहायक कंपनी बनाई गई थी- पालो आल्टो रिसर्च सेंटर उर्फ़ पार्क.

1973 तक पार्क के वैज्ञानिकों और इंजीनियरों ने पर्सनल कंप्यूटर ईजाद कर लिया था. उसे ज़ेरॉक्स ऑल्टो कहा गया.

इससे पहले के कंप्यूटर चलाने में बहुत मुश्किल थे मगर ज़ेरॉक्स ऑल्टो आज के पर्सनल कंप्यूटर जैसा था.

उसके साथ माउस था जिससे ग्राफिकल यूज़र इंटरफेस को नेविगेट किया जा सकता था. प्रोग्राम खोलने के लिए यूज़र को कमांड टाइप करने की जगह बस आइकॉन को क्लिक करना होता था.

इसमें ब्रावो नाम का पहला WYSIWYG वर्ड प्रोसेसर जोड़ा गया था जो स्क्रीन पर दिख रहे पाठ को संपादित करने की सहूलियत देता था. आज इस फ़ीचर को सामान्य समझा जाता है.

ज़ेरॉक्स का यह कंप्यूटर इतना आकर्षक था कि पार्क के कर्मचारियों के रिश्तेदार अक्सर रात में उसकी एक झलक देखने प्रयोगशाला में आते थे.लेकिन कंपनी दुविधा में पड़ी रही. इस उत्पाद का व्यवसायीकरण नहीं कर पाई.

दो युवा उद्यमी- स्टीव जॉब्स और बिल गेट्स पार्क में हो रही गतिविधियों से प्रेरित हुए. उन्होंने ज़ेरॉक्स ऑल्टो की ख़ूबियों को अपनी डिज़ाइन में शामिल किया. बाकी जो है वह इतिहास है.

जॉब्स ने बाद में कहा था, “ज़ेरॉक्स कंपनी पूरी कंप्यूटर इंडस्ट्री की मालिक हो सकती थी. वह 90 के दशक की आईबीएम हो सकती थी, वो 90 के दशक की माइक्रोसॉफ्ट हो सकती थी.”

क्यों चूक गए मौका?

कंपनी इतने शानदार मौके पर कैसे चूक सकती थी? ज़ेरॉक्स के पास बड़े निवेश के लिए पैसा था, ब्रैंड की पहचान और प्रतिष्ठा थी. फिर भी वह नई तकनीक को भुनाने में नाकाम रही.

इसका जवाब उस परिघटना में है जिसे ‘कंपीटेंसी ट्रैप’ कहा जाता है. इसमें कंपनी के साथ जुड़ी हुई विशेषज्ञता बदलते हुए और अनिश्चित बाजार से निपटने की उसकी क्षमता बर्बाद कर देती है.

ब्रिटेन के वार्विक बिजनेस स्कूल के लोइज़ोस हेराक्लिअस कहते हैं, “कंपनी अपनी पिछली कामयाबी से अंधी थी.”

नई प्रौद्योगिकी से सामना होने पर यह जड़ता बड़ी समस्या बन जाती है. बढ़ने और विकसित होने की जगह कंपनी सड़ने लगती है. ज़ेरॉक्स जैसी कंपनियों से सबक लेकर ऐसे दुर्भाग्य से बचा जा सकता है.

दोहन और अन्वेषण

कंपीटेंसी ट्रैप की वजहों को समझने के लिए उन दो परस्पर विरोधी ताक़तों को समझना होगा जो कंपनी को आगे ले जाती हैं- मौजूदा उत्पादों का दोहन और भविष्य के अवसरों का अन्वेषण.

इन दोनों के लिए संसाधन और निवेश की ज़रूरत होती है. अगर कंपनी इन दोनों में संतुलन बना ले उसके लिए रास्ता खुल जाता है.

जैसे कोई व्यक्ति दोनों हाथों से काम करने में दक्ष हो, उसी तरह ऐसी कंपनी अपने दोनों विभागों को प्रभावी तरीके के काम में लेती है और कोई एक विभाग दूसरे पर हावी नहीं होता.

हेराक्लिअस जैसे शोधकर्ता इसे लंबे दौर की कामयाबी के लिए सबसे बेहतर रास्ता मानते हैं. दिक्कत तब होती है जब मौजूदा उत्पादों का दोहन करने वाला विभाग कंपनी के कामकाज पर हावी हो जाता है.

ऐसा क्यों होता है, इसकी कई वजहें हैं. मिसाल के लिए, कामयाब संगठनों में अक्सर सख़्त कॉरपोरेट संस्कृति बन जाती है.

हेराक्लिअस कहते हैं, “कामयाब बनने के लिए कंपनी को प्रभावी कुशल प्रणालियां और प्रक्रियाएं बनानी पड़ती हैं.”

समय के साथ कंपनी उस मुकाम पर पहुंच जाती है जब उसका मुख्य व्यवसाय उसकी पहचान के साथ नत्थी हो जाता है.

कंपनी के तौर-तरीके उसके कर्मचारियों में गहराई से पैठ जाते हैं. वे अलिखित नियमों के प्रति सचेत नहीं रह जाते. यह सख़्त रवैया उनको नई संभावनाओं के प्रति अंधा कर सकता है.

इन प्रणालियों पर किए गए भारी निवेश के कारण मैनेजर उनको छोड़ना नहीं चाहते. उन्होंने पहले जो हासिल किया है उसी से चिपके रहना चाहते हैं.

इस मानसिकता के साथ नई तकनीक को अपनाना बहुत कठिन होता है जिसमें पुराने निवेश को मिटाने का ख़तरा हो.

संसाधनों की लड़ाई ज़हरीली राजनीति का नतीजा भी हो सकती है. पार्क जैसे रिसर्च एंड डेवलपमेंट विभाग की अहमियत समझने की जगह दूसरे विभागों के कर्मचारी उनको प्रतिद्वंद्वी के रूप में देखने लगते हैं.

बड़ी कंपनियों में यह आम बात है. हेराक्लिअस का कहना है कि एक कंपनी जो कभी चुस्त थी वह पत्थर बनने लगती है, कारोबार करने के सिर्फ़ एक तरीके में क़ैद हो जाती है.

नेतृत्व क्षमता

प्रौद्योगिकी के इतिहास में कंपीटेंसी ट्रैप के दूसरे भी कई उदाहरण हैं. एटी एंड टी बेल सिस्टम (जो ग्राहम बेल की टेलीफोन कंपनी से विकसित हुई थी) ने 1940 के दशक में मोबाइल संचार पर काम करना शुरू किया था.

तकनीकी मुश्किलों के कारण उसका तुरंत व्यावसायीकरण नहीं हो सका. लेकिन उन मुश्किलों को दूर करने के बाद भी यह कंपनी दुविधा में फंसी रही और दूसरी कंपनियां आगे निकल गईं. उन कंपनियों में मोटोरोला भी थी जिसने पहला सेलफोन बनाया.

फोटोग्राफी कंपनी कोडक ने 1986 ने 1.4 मेगा पिक्सल का कैमरा सेंसर बनाया था. सिमॉन फ्रेजर यूनिवर्सिटी की जी मे गोह का कहना है कि यह पहली कंपनी थी जिसने डिजिटल कैमरा बनाया, फिर डिजिटल टेक्नोलॉजी में यह कंपनी पिछड़ गई.

इसने केमिस्ट्री रिसर्च पर ज़्यादा ध्यान दिया जो फोटोग्राफी का एनालॉग प्रॉसेस था. उसके कर्मचारी पुराने व्यवसाय में इतने रमे हुए थे कि उन्होंने डिजिटल प्रॉसेसिंग की क्षमताओं पर ध्यान ही नहीं दिया.

गोह कहती हैं, “एक और कारक था- संगठन का ढांचा. नये विभाग से पैसे नहीं आते. नकदी के प्रवाह और राजस्व के लिए उसे पारंपरिक व्यवसाय के साथ काम करना होता था.”

नतीजा यह हुआ कि कंपनी ने जोखिम नहीं लिया और दूसरी कंपनियां नई तकनीक में आगे निकल गईं. “कोडक की कमाई (कैमरा) फ़िल्म से हो रही थी. वह उसी से जुड़े उत्पादों को विकसित कर रही थी.”

मैनेजर की नाकामी

संख्या के नज़रिये से देखें तो नई ख़ोज करके उसे नज़रअंदाज़ करने के मामले में ज़ेरॉक्स अव्वल है. हेराक्लियस ने पुराने दस्तावेज़ देखकर और ज़ेरॉक्स के कर्मचारियों का साक्षात्कार करके रिसर्च पेपर लिखा है.

वह कहते हैं, “आज की तकनीक ईजाद करने बावजूद ज़ेरॉक्स ने उनकी क्षमता नहीं पहचानी. यह सब उनके सिर के ऊपर से चला गया.”

संचार की शुरुआती कठिनाइयों का भी इसमें हाथ रहा. पालो आल्टो के शोधकर्ताओं का सीनियर मैनेजमेंट से मिलना भी मुश्किल था.

एक अंदरूनी सूत्र ने उनको बताया कि सीईओ से मुलाकात किसी सम्राट की “राजकीय यात्रा” जैसी थी.

उन्होंने बताया, “आपको अपनी बात कहने के लिए 15 मिनट मिलते थे, लेकिन उन पर अमल नहीं होता था. कोई प्रतिनिधिमंडल नहीं होता था जो समझ सके कि हम क्या कह रहे थे.”

मैनेजर उस नई तकनीक पर पैसा लगाने का जोखिम लेने को तैयार नहीं थे जिसमें मौजूदा ढांचे से पूरी तरह से अलग मूल्य ढांचे की ज़रूरत थी.

ज़ेरॉक्स उन दिनों कीमती मशीनें बनाती थीं जिसे वह किराये पर देती थी और काग़ज, स्याही और रखरखाव के अतिरिक्त पैसे लेती थी.

इस तरीके से कारोबार करने में वे इतने रमे हुए कि प्रबंधन को यह समझ में ही नहीं आया कि बड़े पैमाने पर पर्सनल कंप्यूटर बनाकर भी पैसे कमाए जा सकते हैं.

लॉन्च के समय ज़ेरॉक्स ऑल्टो की कीमत 32 हजार डॉलर रखी गई. यह ज़्यादातर उपभोक्ताओं की पहुंच से बाहर थी.

पार्क के शोधकर्ताओं ने बार-बार अनुरोध किया लेकिन प्रबंधन ने सस्ते संस्करण के विकास में पैसा लगाने से इनकार कर दिया.

सस्ते कंप्यूटर की जगह उन्होंने एक नया टाइप राइटर बनाने में पैसा लगाया. दूसरी कंपनियों ने तुरंत ही इस मौके को लपक लिया.

ज़ेरॉक्स ने कई और अवसर गंवाए. हेराक्लियस के मुताबिक कंपनी के कुछ शोधकर्ताओं ने नये प्रकाशन सॉफ्टवेयर भी विकसित किए थे.

ज़ेरॉक्स ने उनकी ख़ोज का इस्तेमाल नहीं किया तो उन शोधकर्ताओं ने अपनी बौद्धिक संपदा को सिर्फ़ 2,000 डॉलर में खरीद लिया और 1982 में अपना नया स्टार्ट-अप बनाया.

वो कंपनी अडोबी थी जो आज 191 अरब डॉलर की कंपनी है जबकि ज़ेरॉक्स सिर्फ़ 4.2 अरब डॉलर की कंपनी है.

क्या सबक सीखा?

हेराक्लियस का कहना है कि कंपीटेंसी ट्रैप में फंसी किसी भी कंपनी को संगठनात्मक बदलाव करने की ज़रूरत होती है. उसे यह सुनिश्चित करना चाहिए कि मैनेजर नई खोज की संभावनाओं के प्रति खुले रहें.

एक उपाय यह है कि सभी कर्मचारियों को कुछ महीने के लिए रिसर्च एंड डेवलपमेंट विभाग में काम करने के लिए प्रेरित किया जाए जिससे वे नई चीजें सीखें और पुरानी विशेषज्ञता में ही बंधे न रहें.

नेतृत्व करने वालों को जूनियर कर्मचारियों की बात भी सुननी चाहिए जो कंपनी को नया नज़रिया दे सकते हैं. कर्मचारियों को कंपनी के फ़ैसले लेने के पीछे की धारणाओं के बारे में सवाल पूछने के लिए प्रेरित करना चाहिए.

हेराक्लियस कहते हैं, “कॉरपोरेट डीएनए में विविधता लाने वाले और यथास्थिति को चुनौती देने वाले तरीके बहुत अहम हैं.”

जीवाश्म बनने से बचने के लिए आपको विकास अपनाने की ज़रूरत है. ज़ेरॉक्स ने भारी कीमत चुकाकर यह सबक सीखा है. इस सबक को ऊपर से नीचे तक सीखने की ज़रूरत है.

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